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गणेशगीता • अध्याय 3 • श्लोक 28
अद्वन्द्वोऽमत्सरो भूत्वा सिद्ध्यसिद्ध्योः समश्च यः । यथाप्राप्त्येह संतुष्टः कुर्वन्कर्म न बध्यते ॥
जो द्वन्द्व और ईर्ष्याहीन होकर सिद्धि-असिद्धि में समान दृष्टि रखते हुए जो कुछ प्राप्ति हो, उसी में सन्तुष्ट रहते हैं, ऐसे प्राणी कर्म करते हुए भी लिप्त नहीं होते।
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