जो इच्छारहित, आत्मजित् एवं सम्पूर्ण परिग्रह का परित्याग किये हैं, ऐसे प्राणी यदि घर में रहकर कर्म भी करें तो उन्हें कुछ पातक नहीं लगता।
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