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गणेशगीता • अध्याय 3 • श्लोक 20
निरीहं योऽभिजानाति कर्म बध्नाति नैव तम् । चक्रुः कर्माणि बुद्ध्यैवं पूर्वं पूर्वं मुमुक्षवः ॥
जो मुझे इच्छारहित जानता है, उसको कर्मबन्धन नहीं होता। ऐसा जानकर पूर्व में मुमुक्षु जन कर्म करते थे।
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