येन येन हि भावेन संसेवन्ते नरोत्तमाः ।
तथा तथा फलं तेभ्यः प्रयच्छाम्यव्ययः स्फुटम् ॥
श्रेष्ठजन जिस-जिस भाव से मेरा सेवन करते हैं, मैं अविनश्वर उनको वैसा फल निश्चय ही देता हूँ।
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