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गणेशगीता • अध्याय 3 • श्लोक 14
निरीहा निर्भियोरोषा मत्परा मद्व्यपाश्रयाः । विज्ञानतपसा शुद्धा अनेके मामुपागताः ॥
इच्छारहित, निर्भय, क्रोधहीन, मुझ में ही आश्रित, मेरी ही उपासना करने वाले विज्ञान और तपस्या से शुद्ध होकर अनेक प्राणी मुझको प्राप्त हो गये हैं।
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