वर्णाश्रमान्मुनीन्साधून्पालये बहुरूपधृक् ।
एवं यो वेत्ति संभूतिर्मम दिव्या युगे युगे ॥
अनेक रूप धारणकर मैं वर्ण, आश्रम, मुनि और साधुओं का पालन करता हूँ, इस प्रकार से जो युग-युग में
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