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गणेशगीता • अध्याय 3 • श्लोक 11
उच्छिद्याधर्मनिचयं धर्मं संस्थापयामि च । हन्मि दुष्टांश्च दैत्यांश्च नानालीलाकरो मुदा ॥
मैं अधर्म के समूह को नष्टकर धर्म का स्थापन करता हूँ और अनेक प्रकार की लीलाकर आनन्द से दुष्टों तथा दैत्यों का वध करता हूँ।
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