अधर्मोपचयो धर्मापचयो हि यदा भवेत् ।
साधून्संरक्षितुं दुष्टांस्ताडितुं संभवाम्यहम् ॥
जिस समय अधर्म की वृद्धि और धर्म की हानि होती है, उस समय साधुओं की रक्षा और दुष्टों को मारने के लिये मैं अवतार लेता हूँ।
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