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गणेशगीता • अध्याय 2 • श्लोक 9
मदर्थे यानि कर्माणि तानि बध्नन्ति न क्वचित् । सवासनमिदं कर्म बध्नाति देहिनं बलात् ॥
जो कर्म मेरे निमित्त किये जाते हैं, वे कहीं और कभी बन्धन के कारण नहीं होते, किंतु जो वासनापूर्वक (फलासक्तिपूर्वक) किये गये कर्म हैं, वे ही बलात् प्राणी को बाँधते हैं।
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