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गणेशगीता • अध्याय 2 • श्लोक 8
असमर्प्य निबध्यन्ते कर्म तेन जना मयि । कुर्वीत सततं कर्मानाशोऽसङ्गो मदर्पणम् ॥
जो प्राणी कर्मों का फल मुझ में समर्पण नहीं करते, वे बन्धन में पड़ते हैं, इस कारण से निष्काम कर्म का अनुष्ठान करते हुए निरन्तर मुझे अर्पण करके कर्मबन्धन का नाश करना चाहिये।
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