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गणेशगीता • अध्याय 2 • श्लोक 7
अकर्मणः श्रेष्ठतमं कर्मानीहाकृतं तु यत् । वर्ष्मणः स्थितिरप्यस्याकर्मणो नैव सेत्स्यति ॥
कर्म न करने से तो फल की कामना करके भी कर्म करना श्रेष्ठ है, कारण कि सब कर्मों का त्याग करने से तो शरीर-यात्रा भी नहीं हो सकती।
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