तद्ग्रामं संनियम्यादौ मनसा कर्म चारभेत् ।
इन्द्रियैः कर्मयोगं यो वितृष्णः स परो नृप ॥
हे राजन्! जो मन से इन्द्रियों का संयम करके कर्मेन्द्रियों से निष्काम कर्मयोग का अनुष्ठान करता है, वही श्रेष्ठ पुरुष है।
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