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गणेशगीता • अध्याय 2 • श्लोक 5
कर्मकारीन्द्रियग्रामं नियम्यास्ते स्मरन्पुमान् । तद्गोचरान्मन्दचित्तो धिगाचारः स भाष्यते ॥
जो कर्म करने वाला, इन्द्रियों को रोक कर मन-ही-मन में इन्द्रियों के विषयों का स्मरण करता है, उस इन्द्रियलोलुप दुरात्मा को तुच्छ आचार वाला कहा जाता है।
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