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गणेशगीता • अध्याय 2 • श्लोक 43
बुद्ध्वैवमात्मनात्मानं संस्तभ्यात्मानमात्मना । हत्वा शत्रुं कामरूपं परं पदमवाप्नुयात् ॥ इति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषदर्थगर्भासु योगामृतार्थशास्त्रे श्रीगणेशपुराणे उत्तरखण्डे गजाननवरेण्यसंवादे कर्मयोगो नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥
इस प्रकार बुद्धि से आत्मा को जानकर, बुद्धि से ही मन को स्थिर करके कामरूपी शत्रु को मारकर परम पद को प्राप्त करना चाहिये।
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