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गणेशगीता • अध्याय 2 • श्लोक 4
कदाचिदक्रियः कोऽपि क्षणं नैवावतिष्ठते । अस्वतन्त्रः प्रकृतिजैर्गुणैः कर्म च कार्यते ॥
किसी दशा में क्षणमात्र भी कर्म बिना किये कोई नहीं रह सकता है। प्रकृति के स्वाभाविक तीनों गुण सबको ही अवश्य करके कर्म कराते हैं।
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