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गणेशगीता • अध्याय 2 • श्लोक 35
शस्तोऽगुणो निजो धर्मः सांगादन्यस्य धर्मतः । निजे तस्मिन्मृतिः श्रेयोऽपरत्र भयदः परः ॥
अपना धर्म यदि गुणरहित हो तो भी अच्छा है और दूसरे का धर्म गुणयुक्त होने से भी भला नहीं, अपने धर्म में मरना भी परलोक में कल्याणकारी है, परंतु दूसरे का श्रेष्ठ धर्म भी भय प्रदान करता है।
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