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गणेशगीता • अध्याय 2 • श्लोक 29
कुर्वन्ति सफलं कर्म गुणैस्त्रिभिर्विमोहिताः । अविश्वस्तः स्वात्मद्रुहो विश्वविन्नैव लंघयेत् ॥
सत्त्व, रज, तम - इन तीन गुणों से मोहित हुए प्राणी फल की इच्छा से कर्म करते हैं, उन अविश्वासी और आत्मद्रोहियों को सर्वज्ञ पुरुष कर्ममार्ग से चलायमान न करे।
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