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गणेशगीता • अध्याय 2 • श्लोक 28
यस्तु वेत्त्यात्मनस्तत्त्वं विभागाद्गुणकर्मणोः । करणं विषये वृत्तमिति मत्वा न सज्जते ॥
जो कोई आत्मज्ञ सत्त्वादि गुण तथा उनके कर्मों के विभाग को इस प्रकार जानते हैं कि इन्द्रियाँ अपने विषयों में वर्तमान हैं तो वे ऐसा जानकर कर्म में लिप्त नहीं होते।
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