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गणेशगीता • अध्याय 2 • श्लोक 27
अविद्यागुणसाचिव्यात्कुर्वन्कर्माण्यतन्द्रितः । अहंकाराद्भिन्नबुद्धिरहंकर्तेति योऽब्रवीत् ॥
अविद्या और गुणों के वशीभूत हुआ निरन्तर कर्म करने में लगा हुआ व्यक्ति अहंकार से मूढ़ होकर अपने को कर्ता बताता है।
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