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गणेशगीता • अध्याय 2 • श्लोक 25
कामिनो हि सदा कामैरज्ञानात्कर्मकारिणः । लोकानां संग्रहायैतद्विद्वान् कुर्यादसक्तधीः ॥
जिस प्रकार से कामना वाले अज्ञान से सदा कर्म करते रहते हैं, इसी प्रकार विद्वान्‌ को उचित है कि लोकसंग्रह के निमित्त आसक्तिरहित होकर वह कर्म करता रहे।
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