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गणेशगीता • अध्याय 2 • श्लोक 13
हुतावशिष्टभोक्तारो मुक्ताः स्युः सर्वपातकैः । अदन्त्येनो महापापा आत्महेतोः पचन्ति ये ॥
जो देवाराधनरूप यज्ञ करके अवशिष्ट अन्न का भोजन करते हैं, वे सब पापों से मुक्त होते हैं और जो अपने निमित्त ही भोजन बनाते हैं, वे पापी मानो पाप का ही भोजन करते हैं।
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