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गणेशगीता • अध्याय 2 • श्लोक 11
सुरांश्चान्नेन प्रीणध्वं सुरास्ते प्रीणयन्तु वः । लभध्वं परमं स्थानमन्योन्यप्रीणनात्स्थिरम् ॥
तुम देवताओं को अन्न से तृप्त करो, देवता तुमको (वर्षा आदि से) प्रसन्न करें, इस प्रकार परस्पर वृद्धि करते हुए तुम और देवता सब श्रेष्ठ स्थान को प्राप्त हों।
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