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गणेशगीता • अध्याय 2 • श्लोक 10
वर्णान्सृष्ट्वावदं चाहं सयज्ञांस्तान्पुरा प्रिय । यज्ञेन ऋध्यतामेष कामदः कल्पवृक्षवत् ॥
पूर्वकाल में मैंने यज्ञरूप नित्यकर्म के ही साथ-साथ मनुष्यों के वर्णां को रचकर कहा हे मनुष्यो! तुम यज्ञ से वृद्धि को प्राप्त हो, यह शिक्षा कल्पवृक्ष के समान तुम्हारी इष्टसिद्धि को देने वाली हो।
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