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गणेशगीता • अध्याय 2 • श्लोक 1
वरेण्य उवाच- ज्ञाननिष्ठा कर्मनिष्ठा द्वयं प्रोक्तं त्वया विभो । अवधार्य वदैकं मे निःश्रेयसकरं नु किम् ॥
वरेण्य ने कहा - हे भगवन्! आपने ज्ञाननिष्ठा और कर्मनिष्ठा दोनों का वर्णन किया, आप दोनों में से एक निश्चयकर जो कल्याणदायक हो, उसे कहिये।
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