इति ते कथितो राजन्प्रसादाद्योगौत्तमः ।
सांगोपांगः सविस्तारोऽनादिसिद्धो मया प्रिय ॥
प्रिय राजन्! इस प्रकार तुम्हारे स्नेह से मैंने अंग-उपांगसहित विस्तारपूर्वक अनादि सिद्धयोग का वर्णन किया, यह योग परमोत्तम है।
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