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गणेशगीता • अध्याय 11 • श्लोक 34
स्वस्वकर्मरता एते मय्यर्प्याखिलकारिणः । मत्प्रसादात्स्थिरं स्थानं यान्ति ते परमं नृप ॥
हे राजन्! ये सब वर्ण अपने-अपने कर्म यथावत् करते हुए और सम्पूर्ण कर्म मुझे अर्पण करते हुए मेरी कृपा से निश्चल परम स्थान को प्राप्त करते हैं।
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