प्रभुता मन औनत्यं सुनीतिर्लोकपालनम् ।
पञ्चकर्माधिकारित्वं क्षात्रं कर्म समीरितम् ॥
प्रभुता, मन की उदारता, अच्छी नीति, लोकपालन (तथा राज्यपालन) के पाँच कर्मों में अधिकार - ये क्षत्रियों के स्वाभाविक कर्म हैं।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
गणेशगीता के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
गणेशगीता के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।