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गणेशगीता • अध्याय 11 • श्लोक 3
मर्मास्पृक्च प्रियं वाक्यमनुद्वेगं हितं ऋतम् । अधीतिर्वेदशास्त्राणां वाचिकं तप ईदृशम् ॥
मर्मस्पर्शी प्रिय वचन बोलना, उद्वेगरहित हितकारी और सत्य भाषण करना, वेद-शास्त्रों का पढ़ना - यह वाचिक तप है।
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