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गणेशगीता • अध्याय 11 • श्लोक 28
अन्तर्बाह्येन्द्रियाणां च वश्यत्वमार्जवं क्षमा । नानातपांसि शौचं च द्विविधं ज्ञानमात्मनः ॥
बाह्य और अन्तः इन्द्रियों को वश में करना, सरलता, क्षमा, अनेक प्रकार के तप, पवित्रता, दोनों प्रकार (अन्वयव्यतिरेक) से आत्मा का ज्ञान,
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