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गणेशगीता • अध्याय 11 • श्लोक 26
राजन्ब्रह्मापि त्रिविधमोंतत्सदिति भेदतः । त्रिलोकेषु त्रिधा भूतमखिलं भूप वर्तते ॥
हे राजन्! ब्रह्म भी ओम्, तत्, सत् - इस भेद से तीन प्रकार का है और हे राजन्! इस त्रिलोकी में सब कुछ तीन होकर ही व्याप्त हैं।
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