प्रसादात्स्वस्य बुद्धेर्यत्सात्त्विकं सुखमीरितम् ।
विषयाणां तु यो भोगो भासतेऽमृतवत्पुरा ॥
जो अपनी बुद्धि को आनन्द देने वाला हो, वह सात्त्विक सुख कहा गया है। विषयों का जो भोग प्रथम तो अमृत के समान विदित हो और
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