विषवद्भासते पूर्वं दुःखस्यान्तकरं च यत् ।
इष्यमानं तथाऽऽवृत्त्या यदन्तेऽमृतवद्भवेत् ॥
जो पहले तो विष के समान प्रतीत हो, किंतु दुःख का अन्त करने वाला हो और मनोवृत्ति से इच्छा किया हुआ जो अन्त में अमृत के समान हो तथा
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