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गणेशगीता • अध्याय 11 • श्लोक 2
गुरुविज्ञद्विजातीनां पूजनं चासुरद्विषाम् । स्वधर्मपालनं नित्यं कायिकं तप ईदृशम् ॥
गुरु-पण्डित-ब्राह्मण एवं देवता का पूजन करना तथा नित्य स्वधर्म का पालन करना - यह कायिक तप है।
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