कुर्वन्हर्षं च शोकं च हिंसां फलस्पृहां च यः ।
अशुचिर्लुब्धको यश्च राजसोऽसौ निगद्यते ॥
जो हर्ष-शोक सहित कर्म करता है, हिंसा और फल में इच्छा रखता है, जिसमें अपवित्रता और लोभ है, वह राजसी कर्ता कहा जाता है।
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