ज्ञानं च त्रिविधं राजन् शृणुष्वराजन् शृणुष्व स्थिरचेतसा ।
त्रिधा कर्म च कर्तारं ब्रवीमि ते प्रसंगतः ॥
हे राजन्! मन लगाकर सुनो, ज्ञान भी तीन प्रकार का है, कर्म और कर्ता भी तीन प्रकार के हैं, वह मैं प्रसंग से कहता हूँ।
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