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गणेशगीता • अध्याय 10 • श्लोक 9
सदम्भकर्मकर्तृत्वं स्पृहा च परवस्तुषु । अनेककामनावत्त्वं सर्वदाऽनृतभाषणम् ॥
पाखण्ड सहित कर्म करना, दूसरे की वस्तुओं को पाने की इच्छा, अनेक कामनायुक्त होना, सदा झूठ बोलना,
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