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गणेशगीता • अध्याय 10 • श्लोक 6
द्वेषो हिंसाऽदया क्रोध औद्धत्यं दुर्विनीतता । आभिचारिककर्तृत्वं क्रूरकर्मरतिस्तथा ॥
द्वेष, हिंसा, क्रूरता, क्रोध, उद्धतता, विनयहीनता, दूसरों के नाश के निमित्त अभिचार कर्म, क्रूर कर्मों में प्रीति।
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