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गणेशगीता • अध्याय 10 • श्लोक 3
अपैशून्यं दयाऽक्रोधश्चापल्यं धृतिरार्जवम् । धृतिरार्जवम् तेजोऽभयमहिंसा च क्षमा शौचममानिता ॥
चुगली न करना, दया, अक्रोध, अचपलता, धैर्य, सरलता, तेज, अभय, अहिंसा, क्षमा, शौंच, निरभिमानिता इत्यादि चिह्न दैवी प्रकृति के समझने चाहिये। अब आसुरी के चिह्न सुनो।
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