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गणेशगीता • अध्याय 10 • श्लोक 19
सापि भक्तिस्त्रिधा राजन्सात्त्विकी राजसीतरा । यद्देवान्भजते भक्त्या सात्त्विकी सा मता शुभा ॥
हे राजन्! वह भक्ति भी सात्त्विकी, राजसी और तामसी - इन भेदों से तीन प्रकार की है, जिस भक्ति से देवताओं का भजन किया जाता है, वह कल्याणकारिणी सात्त्विकी भक्ति कही गयी है।
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