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गणेशगीता • अध्याय 10 • श्लोक 15
लभन्ते स्वर्गतिं यज्ञैरन्यैर्धर्मश्च भूमिप । सुलभास्ताः सकामानां मयि भक्तिः सुदुर्लभा ॥
हे राजन्! यज्ञ से अथवा दूसरे कर्मों से स्वर्ग की प्राप्ति होती है, जो सकामी पुरुषों को सुलभ है, परंतु मुझमें भक्ति होना दुर्लभ है।
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