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गणेशगीता • अध्याय 10 • श्लोक 14
पुनः पापसमाचारा मय्यभक्ताः पतन्ति ते । उत्पतन्ति हि मद्भक्ता यां कांचिद्योनिमाश्रिताः ॥
पापाचरण वाले तथा मुझमें भक्ति न करने वाले पतित होते हैं, परंतु मेरे भक्त चाहे किसी योनि में जन्म लें, नष्ट नहीं होते, उनका उद्धार हो जाता है।
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