पुनः पापसमाचारा मय्यभक्ताः पतन्ति ते ।
उत्पतन्ति हि मद्भक्ता यां कांचिद्योनिमाश्रिताः ॥
पापाचरण वाले तथा मुझमें भक्ति न करने वाले पतित होते हैं, परंतु मेरे भक्त चाहे किसी योनि में जन्म लें, नष्ट नहीं होते, उनका उद्धार हो जाता है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
गणेशगीता के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
गणेशगीता के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।