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दुर्गासप्तशती • अध्याय 9 • श्लोक 53
तान् विषण्णान् सुरान् दृष्ट्वा चण्डिका प्राहसत्वरम् । उवाच कालीं चामुण्डे विस्तीर्णं वदनं कुरु ॥
उन उदास देवताओं को देखकर चण्डिका ने शीघ्रता से काली से कहा— हे चामुण्डे, अपना मुख विस्तृत कर लो।
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