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दुर्गासप्तशती • अध्याय 9 • श्लोक 27
बलावलेपादथ चेद्भवन्तो युद्धकाङ्क्षिणः । तदागच्छत तृप्यन्तु मच्छिवाः पिशितेन वः ॥
यदि बल के अहंकार से तुम युद्ध की इच्छा रखते हो, तो आओ— मेरे शिवगण तुम्हारे मांस से तृप्त होंगे।
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