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दुर्गासप्तशती • अध्याय 6 • श्लोक 79
अवलिप्तासि मैवं त्वं देवि ब्रूहि ममाग्रतः । त्रैलोक्ये कः पुमांस्तिष्ठेदग्रे शुम्भनिशुम्भयोः ॥
हे देवी! तुम अहंकार से भरी हुई ऐसी बातें मेरे सामने मत कहो। तीनों लोकों में कौन ऐसा पुरुष है जो शुम्भ और निशुम्भ के सामने टिक सके?
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