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दुर्गासप्तशती • अध्याय 6 • श्लोक 66
क्षीरोदमथनोद्भूतमश्वरत्नं ममामरैः । उच्चैःश्रवससंज्ञं तत्प्रणिपत्य समर्पितम् ॥
समुद्र मंथन से उत्पन्न उच्चैःश्रवा नामक अश्वरत्न भी देवताओं ने प्रणाम करके मुझे समर्पित कर दिया है।
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