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दुर्गासप्तशती • अध्याय 6 • श्लोक 48
स्त्रीरत्नमतिचार्वङ्गी द्योतयन्ती दिशस्त्विषा । सा तु तिष्ठति दैत्येन्द्र तां भवान् द्रष्टुमर्हति ॥
वह अनुपम स्त्रीरत्न है, अत्यन्त सुन्दर अंगों वाली है और अपने तेज से दिशाओं को प्रकाशित कर रही है। हे दैत्येन्द्र! आपको उसे अवश्य देखना चाहिए।
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