विनियोग:
इस उत्तरचरित्र के मन्त्र के ऋषि रुद्र हैं, देवी महासरस्वती इसकी देवता हैं, छन्द अनुष्टुप है, भीमा इसकी शक्ति है, भ्रामरी इसका बीज है, सूर्य इसका तत्त्व है और यह सामवेदस्वरूप है।
श्री महासरस्वती की प्रसन्नता के लिए उत्तरचरित्र के पाठ में इसका विनियोग किया जाता है।
ध्यान:
मैं उस देवी सरस्वती का ध्यान करता हूँ जो गौरी के शरीर से उत्पन्न हुई हैं, तीनों लोकों की आधार हैं और शुम्भ आदि दैत्यों का संहार करने वाली हैं।
वे अपने कमल समान हाथों में घंटा, त्रिशूल, हल, शंख, मुसल, चक्र, धनुष और बाण धारण करती हैं और उनका तेज वर्षा ऋतु के अंत में चमकने वाले चन्द्रमा के समान है।
ऋषि ने कहा—
पूरा ग्रंथ पढ़ें
दुर्गासप्तशती के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
दुर्गासप्तशती के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।