या मुक्तिहेतुरविचिन्त्यमहाव्रता त्वं अभ्यस्यसे सुनियतेन्द्रियतत्त्वसारैः । मोक्षार्थिभिर्मुनिभिरस्तसमस्तदोषैर् विद्याऽसि सा भगवती परमा हि देवि ॥
आप ही मोक्ष का कारण बनने वाली महान और अचिन्त्य विद्या हैं, जिन्हें संयमित इन्द्रियों वाले और दोषरहित मुनि मोक्ष की इच्छा से साधना करते हैं।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
दुर्गासप्तशती के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
दुर्गासप्तशती के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।