यस्याः समस्तसुरता समुदीरणेन तृप्तिं प्रयाति सकलेषु मखेषु देवि । स्वाहासि वै पितृगणस्य च तृप्तिहेतु-रुच्चार्यसे त्वमत एव जनैः स्वधा च ॥
हे देवी! सभी यज्ञों में जिनके नाम का उच्चारण करने से देवता तृप्त होते हैं, आप ही स्वाहा हैं और पितरों की तृप्ति के लिए आप ही स्वधा कहलाती हैं।
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