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दुर्गासप्तशती • अध्याय 5 • श्लोक 19
दृष्ट्वैव किं न भवती प्रकरोति भस्म सर्वासुरानरिषु यत्प्रहिणोषि शस्त्रम् । लोकान्प्रयान्तु रिपवोऽपि हि शस्त्रपूता इत्थं मतिर्भवति तेष्वहितेषुसाध्वी ॥
हे देवी! आप चाहें तो केवल दृष्टि से ही सभी असुरों को भस्म कर सकती हैं, फिर भी आप शस्त्र चलाती हैं ताकि शस्त्र से शुद्ध होकर वे भी उत्तम लोकों को प्राप्त हों। यही आपकी करुणामयी भावना है।
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